Mirza Ghalib Shayari in Hindi पढ़ना उन लोगों के लिए खास अनुभव है जो इश्क, दर्द, तन्हाई और जिंदगी की गहराई को शायरी के जरिए महसूस करना पसंद करते हैं। ग़ालिब की शायरी सिर्फ अल्फाज़ नहीं, बल्कि दिल के उन एहसासों की आवाज़ है जिन्हें हर दौर का इंसान अपने करीब पाता है। उनकी शायरी में मोहब्बत की नर्मी भी है, जुदाई का दर्द भी है और जिंदगी को समझने वाली गहरी सोच भी है। यही वजह है कि मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी आज भी WhatsApp status, Instagram captions और poetry lovers के बीच बहुत पसंद की जाती है। इस संग्रह में आपको गालिब की मशहूर शायरी, लव शायरी, सैड शायरी और जिंदगी पर कही गई बेहतरीन पंक्तियां पढ़ने को मिलेंगी।
Best Mirza Ghalib Shayari in Hindi

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता।
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
मौत का एक दिन मुअय्यन है,
नींद क्यों रात भर नहीं आती।
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार,
या इलाही ये माजरा क्या है।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ।
हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे।
कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग,
हमको जीने की भी उम्मीद नहीं।
काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’,
शर्म तुमको मगर नहीं आती।
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन,
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।
Mirza Ghalib Love Shayari in Hindi

इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।
तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता।
दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई,
दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई।
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद,
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।
फिर कुछ एक दिल को बे-क़रारी है,
सीना जूया-ए-ज़ख़्म-ए-कारी है।
नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को,
ये लोग क्यों मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर को देखते हैं।
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और।
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है।
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार,
या इलाही ये माजरा क्या है।
हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता,
वगरना शहर में ‘ग़ालिब’ की आबरू क्या है।
तुम न आए तो क्या सहर न हुई,
हाँ मगर चैन से बसर न हुई।
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है,
कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं।
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।
रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो,
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो।
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
Mirza Ghalib Sad Shayari in Hindi

कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
मौत का एक दिन मुअय्यन है,
नींद क्यों रात भर नहीं आती।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ।
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यों,
रोएँगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों।
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं।
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया,
दिल जिगर तिश्ना-ए-फ़रियाद आया।
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।
कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग,
हमको जीने की भी उम्मीद नहीं।
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार,
या इलाही ये माजरा क्या है।
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता।
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।
हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।
कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज़,
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले।
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन,
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।
दर्द भरी ग़ालिब शायरी

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
मौत का एक दिन मुअय्यन है,
नींद क्यों रात भर नहीं आती।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ।
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यों,
रोएँगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों।
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं।
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया,
दिल जिगर तिश्ना-ए-फ़रियाद आया।
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार,
या इलाही ये माजरा क्या है।
कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग,
हमको जीने की भी उम्मीद नहीं।
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।
हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन,
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद,
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।
Ghalib Shayari on Heartbreak

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यों,
रोएँगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों।
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ।
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद,
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।
तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता।
हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन,
ख़ाक हो जाएँगे हम तुमको ख़बर होने तक।
इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई,
मेरे दुख की दवा करे कोई।
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं।
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार,
या इलाही ये माजरा क्या है।
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।
मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त,
मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ।
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया,
दिल जिगर तिश्ना-ए-फ़रियाद आया।
रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो,
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो।
हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।
Mirza Ghalib Shayari on Life

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे।
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता।
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
मौत का एक दिन मुअय्यन है,
नींद क्यों रात भर नहीं आती।
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं।
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग,
हमको जीने की भी उम्मीद नहीं।
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया,
तुझसे भी दिलफ़रेब हैं ग़म रोज़गार के।
हस्ती के मत फ़रेब में आ जाइयो असद,
आलम तमाम हल्का-ए-दाम-ए-ख़याल है।
क़ैद-ए-हयात और बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं,
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों।
हुआ जब ग़म से यूँ बेहिस तो ग़म क्या सर के कटने का,
न होता गर जुदा तन से तो ज़ानू पर धरा होता।
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन,
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।
हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और।
जिंदगी पर मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे।
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता।
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
मौत का एक दिन मुअय्यन है,
नींद क्यों रात भर नहीं आती।
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं।
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।
क़ैद-ए-हयात और बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं,
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों।
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया,
तुझसे भी दिलफ़रेब हैं ग़म रोज़गार के।
हस्ती के मत फ़रेब में आ जाइयो असद,
आलम तमाम हल्का-ए-दाम-ए-ख़याल है।
कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग,
हमको जीने की भी उम्मीद नहीं।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ।
हुआ जब ग़म से यूँ बेहिस तो ग़म क्या सर के कटने का,
न होता गर जुदा तन से तो ज़ानू पर धरा होता।
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन,
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।
हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और।
आदमी को चाहिए वक़्त से सीखना,
वरना जिंदगी हर मोड़ पर नया सबक देती है।
Deep Ghalib Quotes on Life

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता।
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे।
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।
मौत का एक दिन मुअय्यन है,
नींद क्यों रात भर नहीं आती।
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
क़ैद-ए-हयात और बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं,
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों।
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं।
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ।
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यों,
रोएँगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।
कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग,
हमको जीने की भी उम्मीद नहीं।
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है।
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
हस्ती का भरोसा क्या, सब कुछ ख़याल जैसा है,
इंसान खुद को समझे तो सवाल जैसा है।
दुनिया तमाशा है, मगर दिल को समझाना मुश्किल है,
हर चेहरे के पीछे एक अफ़साना मुश्किल है।
जिसे समझा था सहारा, वही राह बदल गया,
जिंदगी का यही रंग है, हर अपना बदल गया।
वक़्त ने सिखाया कि ख़ामोशी भी जवाब होती है,
हर बात का कहना जरूरी नहीं होता।
जिंदगी ग़ालिब के लफ़्ज़ों में एक आईना है,
जो देखे वही अपना हाल पहचान लेता है।
Mirza Ghalib Urdu Shayari in Hindi

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद,
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।
तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता।
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाए न बने,
क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने।
दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई,
दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई।
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार,
या इलाही ये माजरा क्या है।
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ।
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं।
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता।
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।
हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और।
काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’,
शर्म तुमको मगर नहीं आती।
Famous Mirza Ghalib Shayari

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
मौत का एक दिन मुअय्यन है,
नींद क्यों रात भर नहीं आती।
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता।
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यों,
रोएँगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों।
तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता।
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और।
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है,
कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं।
काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’,
शर्म तुमको मगर नहीं आती।
हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन,
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है।
गालिब की मशहूर शायरी

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी,
अब किसी बात पर नहीं आती।
दर्द हो दिल में तो दवा कीजे,
दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजे।
नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाए न बने,
क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने।
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद,
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक।
रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो,
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो।
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।
इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई,
मेरे दुख की दवा करे कोई।
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है,
कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं।
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया,
दिल जिगर तिश्ना-ए-फ़रियाद आया।
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार,
या इलाही ये माजरा क्या है।
दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई,
दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई।
कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग,
हमको जीने की भी उम्मीद नहीं।
हर बात पर कहते हो तुम कि तू क्या है,
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है।
ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है पर कहाँ बचें कि दिल है,
ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता।
जी ढूँढता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन,
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए।
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए,
जोश-ए-क़दह से बज़्म चराग़ाँ किए हुए।
ग़ालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे,
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे।
Two Line Mirza Ghalib Shayari

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
मौत का एक दिन मुअय्यन है,
नींद क्यों रात भर नहीं आती।
इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद,
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार,
या इलाही ये माजरा क्या है।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ।
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं।
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।
तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता।
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और।
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है।
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता।
कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग,
हमको जीने की भी उम्मीद नहीं।
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया,
दिल जिगर तिश्ना-ए-फ़रियाद आया।
काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’,
शर्म तुमको मगर नहीं आती।
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है,
कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं।
Mirza Ghalib Shayari for Instagram Captions

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
दिल में अब भी कई अधूरे अरमान बाकी हैं।
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
दिल चाहे भी तो हर आग बुझाई नहीं जाती।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
कुछ दर्द ऐसे हैं जो चेहरे पर नहीं आते।
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
फिर भी दिल इंतज़ार करना नहीं छोड़ता।
मौत का एक दिन मुअय्यन है,
फिर भी लोग जिंदगी से डरते रहते हैं।
इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी किसी काम के थे।
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
कुछ ख़याल दिल को खुश रखने के लिए होते हैं।
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,
कुछ चेहरे सच में दवा जैसे होते हैं।
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,
आदत हो जाए तो दर्द भी कम लगने लगता है।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
हर ज़ख्म इलाज नहीं चाहता।
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,
कभी खुद से भी पूछो कि मैं क्या हूँ।
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
मगर अंदाज़-ए-बयाँ सबका अलग होता है।
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
कुछ सवाल इंसान को उम्र भर सोचने पर मजबूर रखते हैं।
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
सच्चे दर्द को असर दिखाने में वक़्त लगता है।
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद,
जो वफ़ा का मतलब तक नहीं जानते।
कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग,
हम भी किसी उम्मीद से जुड़े हुए हैं।
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त,
टूटेगा भी और फिर संभलेगा भी।
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
कुछ जवाब आँखों में लिखे होते हैं।
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता,
कुछ लोग याद नहीं, आदत बन जाते हैं।
ग़ालिब का अंदाज़-ए-बयाँ और,
हर एहसास को अल्फाज़ मिल जाते हैं।
Mirza Ghalib Shayari in Hindi Text
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
मौत का एक दिन मुअय्यन है,
नींद क्यों रात भर नहीं आती।
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता।
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यों,
रोएँगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ।
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार,
या इलाही ये माजरा क्या है।
तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता।
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और।
हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।
Conclusion
Mirza Ghalib Shayari in Hindi आज भी लोगों के दिलों में इसलिए खास जगह रखती है क्योंकि इसमें मोहब्बत, दर्द, तन्हाई, जिंदगी और इंसानी एहसासों की गहराई साफ दिखाई देती है। ग़ालिब की शायरी सिर्फ पुराने दौर की कविता नहीं, बल्कि आज के समय में भी दिल की बात कहने का खूबसूरत जरिया है। उनकी लिखी हुई पंक्तियां कभी इश्क़ का एहसास कराती हैं, कभी टूटे दिल को आवाज़ देती हैं और कभी जिंदगी की सच्चाई समझा देती हैं।
इस संग्रह में आपने गालिब की मशहूर शायरी, लव शायरी, सैड शायरी, जिंदगी पर शायरी और दो लाइन शायरी पढ़ी। उम्मीद है कि मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी का यह कलेक्शन आपको पसंद आया होगा और आप इसे अपने WhatsApp status, Instagram captions या poetry collection में आसानी से इस्तेमाल कर पाएंगे।
FAQs
मिर्ज़ा ग़ालिब कौन थे?
मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी भाषा के महान शायर थे। उनका पूरा नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान था। वे अपने तख़ल्लुस “ग़ालिब” के नाम से मशहूर हुए। उनकी शायरी में मोहब्बत, दर्द, तन्हाई, जिंदगी और इंसानी एहसासों की गहराई मिलती है।
Mirza Ghalib Shayari in Hindi क्यों लोकप्रिय है?
Mirza Ghalib Shayari in Hindi इसलिए लोकप्रिय है क्योंकि हिंदी पढ़ने वाले लोग ग़ालिब की शायरी को आसानी से समझ और महसूस कर सकते हैं। उनकी शायरी में ऐसे जज़्बात हैं जो आज भी हर उम्र के लोगों को अपने करीब लगते हैं।
ग़ालिब की सबसे मशहूर शायरी कौन सी है?
ग़ालिब की सबसे मशहूर शायरी में “हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले” और “दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है” जैसी पंक्तियां बहुत प्रसिद्ध हैं। ये शायरी आज भी प्रेम, दर्द और जिंदगी के एहसास को खूबसूरती से बयान करती है।
क्या मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी WhatsApp status के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं?
हाँ, मिर्ज़ा ग़ालिब की दो लाइन शायरी WhatsApp status के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है। उनकी छोटी लेकिन गहरी पंक्तियां दिल की बात को कम शब्दों में खूबसूरती से कह देती हैं।
क्या ग़ालिब की शायरी Instagram captions के लिए अच्छी है?
हाँ, ग़ालिब की शायरी Instagram captions के लिए भी बेहतरीन है। उनकी शायरी में गहराई, क्लासिक अंदाज़ और भावनात्मक आकर्षण होता है, जो किसी भी फोटो या पोस्ट को ज्यादा meaningful बना सकता है।
मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी किन विषयों पर आधारित है?
मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी मुख्य रूप से मोहब्बत, जुदाई, दर्द, तन्हाई, जिंदगी, मौत, उम्मीद, निराशा और इंसानी सोच पर आधारित है। उनकी शायरी सिर्फ इश्क़ तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें जिंदगी को समझने वाली गहरी बात भी मिलती है।
क्या ग़ालिब की शायरी आज भी पढ़ी जाती है?
हाँ, ग़ालिब की शायरी आज भी बहुत शौक से पढ़ी जाती है। लोग उनकी शायरी को किताबों, सोशल मीडिया पोस्ट, WhatsApp status, Instagram captions और poetry collections में पसंद करते हैं।
Mirza Ghalib Shayari in Hindi किसके लिए उपयोगी है?
Mirza Ghalib Shayari in Hindi उन लोगों के लिए उपयोगी है जो ग़ालिब की शायरी को सरल हिंदी रूप में पढ़ना चाहते हैं। यह poetry lovers, students, content creators और social media users के लिए काफी helpful है।
क्या मिर्ज़ा ग़ालिब ने सिर्फ प्रेम शायरी लिखी है?
नहीं, मिर्ज़ा ग़ालिब ने सिर्फ प्रेम शायरी नहीं लिखी। उनकी शायरी में इश्क़ के साथ-साथ जिंदगी, दर्द, समाज, इंसानी कमजोरी, उम्मीद और दर्शन जैसे गहरे विषय भी शामिल हैं।
ग़ालिब की शायरी इतनी खास क्यों मानी जाती है?
ग़ालिब की शायरी इसलिए खास मानी जाती है क्योंकि उनके शब्द कम होते हैं, लेकिन अर्थ बहुत गहरा होता है। उनकी पंक्तियां इंसान के दिल, दिमाग और जिंदगी के अनुभवों को बहुत खूबसूरती से छूती हैं।